An ode to olfaction: -
तुमसे ही रोशन थी दावते महफ़िल
तुम थे तो फर्क जानते
क्या कलौंजी क्या है तिल
तुमने ही डाली आदतें इत्र के इस्तेमाल की
च्यूइंग गम चबाने की , छिपकर मिट्टी खाने की
वो भी क्या दिन थे जब
झांकते रसोई में क्या बन रह लिट्टी
बेदम हुए जाते थे जो चढ़ी चूल्हे पे
कढ़ाई मलाई की।
तुम्हीं लिए जाते थे गुसलखाने में पैर रोज
मल मल के नहाते थे खुशबू बिखरती थी सभी ओर
तुम थे तो मन कहता था धो डालें सारा घर
बिछाएं गुलाब को हमाम में बा इज़्ज़त
और चंपा चमेली को सजाएं गेशु में
कुछ छौंक दें दाल सब्जी , रायते में हींग
आ जाए खाने में फटाफट से लिज्जत।
गए जो तुम ऐसे गए की मन उदास है
सब सूंघने लगें बस इतनी सी आस है।